मिथला दर्पण

  • कार्तिक २, २०७९
  • ६९३ पटक पढिएको
  • सिरहा टाइम्स
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कोशी गण्डक गंगा हिमालय- बिचमे सुन्दर मिथला बिराजे-२।

ऋषिमुनि के तपोभुमी - जनकपुर तिर्थ धाम कहावे ।

मिथलाक नारी परम संस्कारी - देख बरा घुंघट लगावे -२ ।

साहस धैर्य के अपरम्पारी - सीता माइके याद दिलावे ।

जब बरहे अत्याचार नारी शक्ति पर- दुर्गा माइके रुप दिखावे -२।

कोशी गण्डक गंगा हिमालय - बिचमे सुन्दर मिथला बिराजे-२ ।

प्राण प्रदानक अन्न फल पावे- निर्मल जलके नदिया बहावे।

पान मखान स मिथला जाने - हरियर पान मैथिल चबावे-२।

जितिया चौरचन दशैं दिवाली, छठी माइके पुजन मे - घर घर मे खुशिया मनावे -२।

कोशी गण्डक गंगा हिमालय - बिचमे सुन्दर मिथला बिराजे-२।

आइल वसन्तक ऋतुमे मिथलानी सब चोटि फहरावे ।

रंग भंग मे मातल मैथिल - झुम झुम के होलि गीत गावे -२।

बचपन मे दादिमाइ - गीत गाके लोरि सुनावे ।

दुलार करौत दादाजी ने - पुर्वजके ईतिहास पढावे -२।

कोशी गण्डक गंगा हिमालय - बिचमे सुन्दर मिथला बिराजे-२।

जाती धर्मके बात नै करियौ हम सब मैथिल एक समान ।

धोती कुर्ता गम्छा पगरी - दुनियाँ मे हमर पहचान -२ ।

भोज भण्डारा करैछै मैथिल , करैछै घर घरमे अन्न दान।

सोमबारी और मंगलबारी पावन मे मिथलानी भेल परेसान-२।

कोशी गण्डक गंगा हिमालय - बिचमे सुन्दर मिथला बिराजे-२।

प्रेमक रंगमे रंगल छै मैथिल प्रेमक बनल पुजारी ।

प्रेमभाव स नाता जोरे जैसन दशरथजी ने जनकजी के द्वारी ।

घर मे आइल पाहुनके स्वागतमे- साली परहै छै गाली ।

बैठक कुर्सी लगाके साली - खिस्सा देलक पसारी-२ ।

छप्पन व्यञ्जन बनाके साली भोजन परोसे फुलहा थारी ।

मान दान होइय बरा , जब मैथिल गेल ससुराली-२ ।

कोशी गण्डक गंगा हिमालय बिचमे सुन्दर मिथला बिराजे-२।

लेखक: राज कुमार साफी

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